सिर्फ इसी ‘एक हार’ ने एनडी को ‘प्रधानमंत्री’ बनने से रोक दिया

जीवन का हर चुनाव जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, एक ऐसा चुनाव हार गए जब वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। इलाहाबाद छात्र संघ के पहले अध्यक्ष बनने से लेकर केन्द्र सरकार में उद्योग, वाणिज्य, पेट्रोलियम और वित्त मंत्री के साथ-साथ योजना आयोग के उपाध्यक्ष तक बनने वाले एनडी तिवारी अपने जीवन का ऐसा चुनाव हारे जब वे लगभग सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन चुके थे लेकिन शायद किस्मत इसे ही कहते हैं कि अपने जीवन में इससे पहले कभी चुनाव ना हारने वाले एनडी तिवारी 1991 में राजीव गांधी की मानव बम धमाके में हुई असामयिक मौत के बाद प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार बन चुके थे। सहानुभूति की हर ओर जबरदस्त लहर के बावजूद नारायण दत्त तिवारी ‘नैनीताल लोकसभा सीट’ हार गए। अब हारे किस वजह उस तथ्य को भी जान लेते हैं। उन्होंने नैनीताल लोकसभा सीट में हर विधानसभा सीट पर जबरदस्त प्रदर्शन किया लेकिन बरेली की बहेड़ी विधानसभा सीट जो उस दौर में नैनीताल में आती थी वहां उन्हें सबसे कम वोट मिले, जिसकी वजह से उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना चकनाचूर हो गया। उस दौर में बलराज पासी ने हराया था, जो कि चुनावी मैदान के नए खिलाड़ी थे। भाजपा के बलराज पासी ने नारायण दत्त तिवारी को सिर्फ 11,429 वोट से हराया था। हालांकि अपने राजनीतिक जीवन में वे इस बात का जिक्र कर चुके थे कि कहीं हार का मुंह ना देखने वाला एक ऐसे वक्त पर हारा जब वो देश के लिए कुछ नया करने की सोच रहा था।

नारायण दत्त तिवारी के साथ दो रोचक घटनाएँ हुई है पहली की वे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री बनने वाले पहले व्यक्ति थे। कोई भी अब एक ही शख्स दो राज्यों का मुख्यमंत्री नहीं बना है।

दूसरा उनके जीवन और मृत्यु से है। आज जब उनकी मृत्यु हुई है और आज ही के दिन उनका जन्मदिन भी है। 18 अक्टूबर 1925 को उनका जन्म हुआ था और आज 18 अक्टूबर को ही उनका निधन हुआ है।