कुंवारे मन की वाणी है सांझी : विवेक दत्त मथुरिया

विवेक दत्त मथुरिया ।।>> पत्रकार, दैनिक जागरण  सांझी के गीतों से झलकता है लड़कियों का उल्लास और दर्द घर में कुंवारी लड़की न हो तो नहीं बनती सांझी चाहे टेसू और झांझी की लोककथा हो चाहे राधा-कृष्ण की लीलाओं का चित्रण का जरिया हो शुरुआत कहीं से भी हुई हो पर सांझी का यथार्थ यही […]

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‘लोक साहित्य’ और ‘लोक संस्कृति’ दोनों एक-दूसरे के पूरक : आशा शैली

ऋगवेद में लोक शब्द का प्रयोग ‘जन’ के लिए तथा स्थान के लिए हुआ है- ‘‘य इमे रोदसी उमे अहमिन्दमतुष्टवं। विश्वासमत्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनं।। तथा नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीष्र्णो व्यौ समवर्तत। पदभ्यां भूमिद्र्दिशः श्रोत्रातथा लोकां अकल्पयत्।।’’ उपनिषदों में ‘अयं बहुतौ लोकः’ कह कर विस्तार को लक्षित किया गया है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में लोक तथा […]

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घटने लगा एनपीए का आकार

विनय के पाठक : लेखक एवं वरिष्ठ टीवी पत्रकार ।।>> सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की ओर से अच्छी खबर आ रही है। केन्द्र सरकार की सख्ती की वजह से अब बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में कमी आने लगी है, जबकि बैड लोन की रिकवरी तेजी से बढ़ी है। बैंकों के फंसे कर्ज को […]

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शकुनियों को पहचाने की आवश्यकता : अंकुर पाठक

अंकुर पाठक…. जाने-माने विचारक और गरुड प्रकाशन के सीइओ हैं >> आज मैं विश्वास के महत्व पर कहना चाहूँगा कि यह संसार विश्वास पर ही निर्भर है | यदि आप किसी पर भी विश्वास नहीं करेंगे तो जीवन न तो सहज होगा और न ही सम्भव और विश्वास तो अँधा ही होता है | आज […]

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 शेष है अभी ‘कोटा’ गांव की भव्यता

आशा शैली : जानी-मानी साहित्यिक लेखिका एवं विश्लेषक  सहारनपुर और मुजफ्फर नगर के लगभग मध्य में स्थित एक पुराना गाँव ‘‘कोटा’’ एक विवाह के सिलसिले में जब मुझे उ.प्र. के इस छोटे से गाँव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ तो मुझे सबसे पहले गाँव की प्राचीन इमारतें, हवेलियाँ, मन्दिर और तालाब दिखाए गए। कुछ  […]

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अब तो जागो सरकार ! : विनय के पाठक

विनय के पाठक : लेखक एवं टीवी पत्रकार रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट होने के बाद अब वित्त मंत्रालय की नींद टूटी है। गुरुवार को रुपये ने डॉलर के मुकाबले जैसे ही 72 के स्तर को पार किया, वैसे ही वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक में एक साथ हलचल शुरू हो गयी। इस […]

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आस्था और अंधविश्वास के बीच की बारीक लकीर : डा. प्रवीण तिवारी

डा. प्रवीण तिवारी : लेखक एवं टीवी पत्रकार बाबाओं की इस समाज में क्या जरूरत है? बाबा हैं और उनके पीछे बहुत बड़ी भीड़ भी है। नेताओं अभिनेताओं से कहीं ज्यादा बड़ी भीड़। बाबा कुछ भी करें लोग उनके पीछे होते हैं। जब वो व्यवसाय में उतरते हैं तो बड़ी बड़ी कंपनियों के पसीने छूट जाते […]

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