कुंवारे मन की वाणी है सांझी : विवेक दत्त मथुरिया

विवेक दत्त मथुरिया ।।>> पत्रकार, दैनिक जागरण

 सांझी के गीतों से झलकता है लड़कियों का उल्लास और दर्द

घर में कुंवारी लड़की न हो तो नहीं बनती सांझी

चाहे टेसू और झांझी की लोककथा हो चाहे राधा-कृष्ण की लीलाओं का चित्रण का जरिया हो शुरुआत कहीं से भी हुई हो पर सांझी का यथार्थ यही है कि यह कुंवारे मन की वाणी की सहज अभव्यक्ति ही है। ब्रज, बुन्देलखण्ड, मालवा, राजपुताना से लेकर अवध तक सभी जगह ग्रामीण अंचलों में यह एक ऐसी परंपरा के रूप में निभाई जाती रही है जिसमें यह सिर्फ कुंवारी लड़कियों द्वारा निभाई जाती है।

पितृ पक्ष में अमावस्या से शुरू होकर पूर्णिमा तक घरों के बाहर दरवाजे के एक और दीवाल पर गोबर से बनी फूल-पत्तियों से सुसज्जित आकृतियां देखी जा सकती हैं। यही सांझी है इसके चित्रण पर गौर करें तो पाएंगे कि इसमें लड़कियों की ऐसी रचनात्मकता है जो उन्हें भावी ससुराल के माहौल के प्रति कुछ सिखाती नजर आती है। घर के आदर्श माहौल के चित्रण से लेकर घर में प्रयोग होने वाली तमाम वस्तुओं के चित्र गोबर से हर दिन बदल-बदल कर उकेरे जाते हैं और गेंदा, टगर और कनेर के फूलों की पंखुड़ियों से इन्हें सजाया जाता है। सांझी की कल्पना एक ऐसी देवी के रूप में की गई नजर आती है जो लड़की को उसकी ससुराल में एक प्रेम और सम्मान भरी जिंदगी दिलाती है।

सांझी का भाव पक्ष उसके गीतों में साफ नजर आता है। शाम की सब लड़कियां इकट्ठी होकर सांझी का पूजन कर उसके सामने गीत गाकर पंजीरी का प्रसाद एक-दूसरे को देती हैं। सांझी के गीतों में लड़कियां अपनी ससुराल में सुख और सम्मान की कामना करती हैं। सास और ननद के संभावित गुस्से के प्रति इनमें भय दिखता है वहीं पति से प्रेम पाने की आकांक्षा भी झलकती है। इन गीतों में लड़कियां सास-ननद के उत्पीड़न का मजाक बनाती है और मायके के प्रति प्रेम झलकाती हैं।

“सांझी एक प्राचीन लोक परंपरा है जो कुंवारी लड़कियों की अभिव्यक्तियों का सहज चित्रण है। यह घर में लड़कियों के होने की पहचान भी है। जिस घर में कोई कुंवारी लड़की न हो उस घर की दीवाल सांझी चित्रण के बिना अधूरी-अभागी सी नजर आती है। लोग मनाते हैं काश घर में कोई बेटी जन्मे और दीवाल सांझी के चित्रण से खिल उठे।”

— योगेंद्र सिंह छोंकर

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