सिर्फ एक जज…वो भी महिला, इन्होंने ही किया सबरीमाला मंदिर में जाने का विरोध

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800 वर्ष पुरानी परम्परा को सुप्रीम कोर्ट ने किया ध्वस्त… 

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी। हालांकि, इस मामले में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपने साथी चारों जजों से अलग फैसला दिया। उन्होंने करीब 800 साल पुराने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के फैसले पर असहमति जताई। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस आर नरीमन ने एक राय में महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया। जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा की राय बाकि जजों से अलग थी।

आखिर क्या तर्क दिए जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने…. जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि धर्मिक मुद्दों में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए। अगर किसी को धार्मिक प्रथा में भरोसा है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। ये प्रथाएं संविधान से संरक्षित हैं। इस मुद्दे का असर काफी दूर तक पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि समानता के अधिकार को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ ही देखना चाहिए। कोर्ट का काम प्रथाओं को रद्द करना नहीं है। धार्मिक रूप से कौन सी परिपाटी जरूरी है इसका फैसला श्रद्धालुओं को करना चाहिए ना की कोर्ट को। इंदु मल्होत्रा ने यह भी कहा कि पूजा का तरीका भक्त पर निर्भर करता है कि वह कैसे आराधना करता है। अदालत यह नहीं बता सकता कि किस तरह से पूजा की जानी चाहिए।

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