शेष है अभी ‘कोटा’ गांव की भव्यता

आशा शैली : जानी-मानी साहित्यिक लेखिका एवं विश्लेषक 

सहारनपुर और मुजफ्फर नगर के लगभग मध्य में स्थित एक पुराना गाँव ‘‘कोटा’’ एक विवाह के सिलसिले में जब मुझे उ.प्र. के इस छोटे से गाँव में जाने का अवसर प्राप्त हुआ तो मुझे सबसे पहले गाँव की प्राचीन इमारतें, हवेलियाँ, मन्दिर और तालाब दिखाए गए। कुछ  समाचार पत्रों की कतरने दिखाई गईं। बुद्धि चकरा गई, एक छोटे से गाँव में समृद्धि के खण्डहर देखकर। सबसे पहले तो कोटा नाम से ही राजस्थान के कोटा नगर का भ्रम होता है, इस गाँव का नाम कोटा किसने और क्यों रखा इस बारे में बड़े बूढ़ों से केवल इतना ही पता चला कि इस गाँव को चरना का कोटा कहा जाता है। चरना के बारे में एक दन्तकथा प्रसिद्ध है।

कहा जाता है कि चरना अग्रवाल लोगों के एरन गोत्र में से था जो गाँव में आवश्यक वस्तुओं की फेरी लगाता था। धीरे-धीरे वह यहीं का होकर रह गया। एक दिन चरना प्रातः काल पानी का लोटा लेकर जंगल में घुसा तो उसे एक स्त्री ने पुकारा, ‘‘चरना ओ चरना। मैं तेरे घर आना चाहती हूँ।’’ चरना ने पूछा कि ‘‘तू कौन है? तो स्त्री ने उत्तर दिया कि’’ मैं लक्ष्मी हूँ। ‘‘चरना ने कहा कि किस रूप में आयेगी?’’ स्त्री बोली ‘‘तू कैसे ले जाएगा?’’ चरना ने कहा ‘‘बहन बना कर’’ ‘‘नहीं बहन तो नहीं’’, और चरना लौट आया। कई दिन गुजर गये, एक दिन फिर आवाज आई, ‘‘चरना ने कहा माँ बनकर आ जा।’’ स्त्री फिरमुकर गई। तीसरी बार जब उसने फिर पुकारा तो चरना ने कहा कि, ‘‘माँ भी नहीं
बनती, बहन भी नहीं बनती तो पत्नी बन जा।’’ इस पर स्त्री उसके घर आ गई किन्तु एक शर्त भी रख दी कि जब तक तेरे घर में निर्माण चलता रहेगा मैं यहाँ रहूँगी। काम बन्द होते ही वापस लौट जाऊँगी। चरना मान गया और गाँव में धड़ाधड़ निर्माण होने लगा। चरना कौन था कहाँ से आया था इसके बारे में जनमत मौन है, किन्तु इतना तो निर्विवाद है कि चरना के आधिपत्य में उस समय 52 गाँव थे। जिनमें कुछ के नाम हैं सिड़की, वाजिदपुर, सीदरपुर, नाखलौर, कपासी, कपासा, खेखपुरा, खजूरवाला, बाह़ड़पुर, मड़की, नवगाँव, कुशली वगैरह-वगैरह। किसी भी नगर-गाँव अथवा स्मारक के इतिहास के साथ दन्त कथाएं अवश्य ही जुड़ी रहती हैं फिर भी प्रश्न अपनी जगह है कि आखिर एक बनिए के पास यह रियासत आई कहाँ से ?

गाँव के बूढ़े बुजुर्गों से पता चला कि यह इमारतें लगभग तीन सौ साल पुरानी है। गाँव के मन्दिरों और हवेलियों को देखने से उनका सम्बन्ध कहीं न कहीं मुगल काल के राजस्थानी स्थापत्य से जुड़ता है। बड़ी-बड़ी हवेलियों के नीचे बनी सुरंगे; जो केवल महिलाओं को ताल तक लाने ले जाने को काम आती थी आज बन्द कर दी गई हैं।द्ध हवेली में पर्दा प्रथा का इतिहास कहती हैं। हवेली की ऊपरी मंजिलों पर बने गाँव के छोटे-छोटे कक्ष और भीतर की चित्रकला एक खोज को निमन्त्रण देती हैं। गाँव के चारों कोनों पर सूखे पड़े तालों पर ऊँची बुर्जी वाली मीनारों के खण्डहर अभी बाकि हैं अपनी कहानी कहने के लिए। गाँव का विस्तृत अवलोकन करने से पता चसलता है कि आज से तीन-साढ़े तीन सौ साल पहले गाँव समृ( की चरम सीमा पर रहा है। इसका एक प्रमाण गाँव का सहारनपुर के मुख्य मार्ग पर स्थित होना भी है। आश्चर्य की बात है कि इन पुराने भवनों के मध्य चार-पाँच मन्दिर चर्मकारों के भी हैं। यानि चर्म उद्योग भी इतना समृ( था कि वे अपने भव्य मन्दिर बनवा सकें। न केवल कोटा गाँव समृद्ध था अपितु वहाँ एक संस्ड्डत विद्यालय में इस समय भी स्कूल चलाया जा रहा है, इसी विद्यालय के माध्य में बने दो मन्दिर चरना के कहे जाते हैं। जिनमें से एक मन्दिर राधा-कृष्ण का है और दूसरा शिव का। शिव मन्दिर के बाहर पूरे कद-काठ का पत्थर का नन्दी बैठा है और भीतर एक मीटर व्यास का शिवलिंग। इस श्विलिंग के आधार में ग्यारह शिवलिंग और बने हुए हैं।

अर्थात एक साथ ही द्वादश लिंग स्थापित हैं इस मन्दिर में राधा-कृष्ण मन्दिर के साथ ही कुँआ बना हुआ है जिससे संस्कृत विद्यालय की आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। संस्कृत विद्यालय का मुख्यद्वार ही इतना बड़ा है जहाँ बीस व्यक्ति आराम से सो सकते हैं। इस दो मंजिले भवन में इस समय पाठशाला के अतिरिक्त एक डिस्पेंसरी भी चलाई जा रही है और विद्यालय, मन्दिर व डिस्पेंसरी के कर्मचारी भी रहते हैं।
गाँव के एक ओर बने ताल पर पक्के घाट हैं जो अभी काफी मजबूत हैं। इसी के साथ आम के वृक्ष हैं जो कभी पक्के बाग का एक हिस्सा थे। इस समय तो इन बड़ी-बड़ी हवेलियों में पशु बन्धे रहते हैं। राधा-ड्डष्ण मन्दिर के भित्तिचित्रों में रासलीला के दृश्य लुभावने रंगों में उकेरे गये हैं। एक गुम्बद के भीतरी भाग में कुछ हाथी बने हुए हैं। जिन्हें ध्यान से देखने पर उन हाथियों की मुखाकृति में ग्यारह स्त्रियों के चित्र दिखाई देते हैं। आज से केवल पाँच वर्ष पूर्व सन 1994 में कोटा गाँव के बारे में एक लेख विश्व मानव में प्रकाशित हुआ था, जिसमें एक चमत्कारी कटोरी का भी वर्णन था। इस कटोरी के तले में एक छिद्र था और कटोरी में वासुदेव कृष्ण कसे सर पर उठाए जमुना पार करने की मुद्रा में स्थित थे। कटोरी का चमत्कार यह था कि पूरी भरी होने पर भी पानी ऊपर से बहे किन्तु जैसे ही कृष्ण के पाँव पानी का स्पर्श करते कि पानी छिद्र द्वारा बाहर निकलता। किन्तु इस लेख के प्रकाशित होने के बाद यह चमत्कारी कटोरी चोरी हो गई और बेचारे पत्रकार की शामत आ गई । लेकिन इसके बावजूद भी पुरातत्व के महत्व के इन भवनों के रख-रखाव का कांई प्रबन्ध इस लिए भी नहीं है क्योंकि ये आज भी
निजी सम्पत्ति हैं। अभी इन स्मारकों को पूरी तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है। कम से कम मन्दिरों का रख-रखाव सरकार को अपने हाथ में ले लेना चाहिए।

2 thoughts on “ शेष है अभी ‘कोटा’ गांव की भव्यता

  1. बहुत ही अच्छा लेख,,,,,,कोटा की संस्कृति से परिचय करवाता हुआ,,,,

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