अब तो जागो सरकार ! : विनय के पाठक

विनय के पाठक : लेखक एवं टीवी पत्रकार

रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट होने के बाद अब वित्त मंत्रालय की नींद टूटी है। गुरुवार को रुपये ने डॉलर के मुकाबले जैसे ही 72 के स्तर को पार किया, वैसे ही वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक में एक साथ हलचल शुरू हो गयी। इस बात पर विचार किया जाने लगा कि क्या अब करेंसी मार्केट में आरबीआई को हस्तक्षेप करना चाहिए। खबरों के मुताबिक रुपये में गिरावट को लेकर वित्त मंत्रालय में लगातार माथापच्ची होती रही। माना जा रहा है कि इस मुद्दे को लेकर मंत्रालय और आरबीआयी के अधिकारियों के बीच जल्द ही मीटिंग हो सकती है।

इस क्रम में इस बात को भी याद रखना चाहिए कि पिछले हफ्ते तक वित्त मंत्रालय रुपये की गिरावट पर बार-बार यही कह रहा था कि अंतरराष्ट्रीय दबाव एवं वैश्विक मुद्रा बाजार की हलचल की वजह से ही रुपये की कीमत में गिरावट आयी है और जैसे ही अंतरराष्ट्रीय स्थितियां ठीक होंगी, रुपया खुद ही अपने सही स्तर पर पहुंच जायेगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि रुपये की कीमत 70 के आसपास बनी रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए इसी स्तर को रुपये का सही स्तर मानना चाहिए। लेकिन मुद्रा बाजार में अभी जो रुझान बना हुआ है, उससे लगता है कि जल्द ही रुपया 73 के स्तर को भी पार कर सकता है। यही कारण है कि पिछले हफ्ते तक निश्चिंत नजर आ रहा देश का वित्त मंत्रालय अचानक काफी सक्रिय हो गया है।Screenshot (942)

माना जा रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक 2013 में बनायी अपनी उस पॉलिसी की एक बार फिर से समीक्षा कर सकता है, जिसके तहत विदेशी मुद्रा विनिमय विंडो को खोला गया था। ऐसा करने का उद्देश्य देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की रोजाना की डॉलर की जरूरतों को पूरा करना था। जानकारों का मानना है कि आरबीआई इस तरीके का इस्तेमाल करके विदेशी मुद्रा बाजार में मांग के हिसाब से रोजाना साठ करोड़ डॉलर तक डाल सकता है। केंद्रीय बैंक यदि अगर ऐसा करता है, तो इससे भारतीय मुद्रा की अस्थिरता को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही इसे और नीचे गिरने से भी रोका जा सकेगा। हालांकि इसका एक दुष्प्रभाव यह भी होगा कि इस कदम से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यद्यपि इस विषय में राहत की बात यह है कि अभी देश का विदेशी मुद्रा भंडार काफी मजबूत है और देश में 400 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा पड़ी हुई है।

2013 में विदेशी मुद्रा विनिमय विंडो को खोलने में परेशानी इसलिए आ रही थी, क्योंकि तब देश का विदेशी मुद्रा भंडार अभी की तुलना में काफी कम था। देखा जाए तो अभी की स्थिति और 2013 की स्थिति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। तब भी रुपया रोज गिर रहा था और बाजार में घबराहट का माहौल बना हुआ था। लेकिन उस समय रुपये की गिरावट अभी की तुलना में ज्यादा तेज थी। 2013 की फरवरी और अगस्त के बीच सात महीने में रुपया 23 फीसदी नीचे गिर गया था, जबकि इस साल जनवरी से सितंबर के बीच रुपये की कीमत में 11 फीसदी की गिरावट आयी है। इसी तरह उस समय वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.8 फीसदी था, जो कि अभी 3.5 फीसदी है। वहीं चालू खाते का घाटा 2013 में जीडीपी का 3.4 फीसदी था, जबकि फिलहाल यह दो फीसदी से भी कम है। इसी तरह विदेशी मुद्रा भंडार की अगर बात करें, तो उस समय देश के पास लगभग 285 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो अभी 415 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है।

इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि मौजूदा सरकार अपनी पूर्व सरकार की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है। इसके अलावा दो अन्य बातें भी सरकार की पक्ष में हैं। पहली बात तो ये कि अभी सरकार की ओर से रिजर्व बैंक को इस बात का स्पष्ट अधिकार मिला हुआ है कि वह खुदरा महंगाई दर को नीचे रखने के लिए जरूरी कदम उठाता रहे। इसी तरह दूसरी बात आर्थिक विकास दर की है। 2013 में देश की आर्थिक विकास की रफ्तार लगातार घटती जा रही थी, लेकिन अभी आर्थिक विकास की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद तथ्य यही है कि रुपये की कीमत गिर रही है।

ऐसे में सरकार को फिलहाल दो बड़े कदम उठाने पर विचार करना चाहिए। पहला कदम तो कंज्यूमर डिमांड को हर हालत में ऊंचा बनाये रखने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरा कदम काले धन पर तेज कार्रवाई शुरू करने के रूप में नजर आनी चाहिए। क्योंकि अगर काले धन पर कार्रवाई तेज नहीं हुई तो यही कालाधन विदेशी बाजारों से घूमता हुआ भारत में के शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों के जरिए पहुंचता रहेगा। एक बात यह भी है कि अभी जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भारत आ रहे हैं उनके हितों को चोट पहुंचाने वाली कोई भी पॉलिसी लागू करने से फिलहाल सरकार को बचना चाहिए। क्योंकि ऐसी कोई भी बात इन निवेशकों को भारतीय बाजार से बिदका सकती है। अभी भारत को शांत और स्थिर बाजार के रूप में प्रदर्शित किये जाने की जरूरत है, ताकि निवेशक निश्चिंत होकर भारत में विदेशी मुद्रा के जरिए निवेश कर सकें।

यह एक तथ्य है कि अमेरिका में ब्याज पर दरों के बढ़ने की वजह से पूरी दुनिया से पूंजी का प्रवाह अमेरिका की ओर हो रहा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से तमाम देशों की मुद्रा पर असर पड़ा है। ऐसे में मोदी सरकार से इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि वह असंगत कदम उठाने से बचेंगे। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके तथा विदेशी मुद्रा विनिमय विंडो के जरिए मुद्रा बाजार की मांग के मुताबिक रोजाना पर्याप्त संख्या में डॉलर की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे, जिससे रुपये को और गिरने से न केवल रोका जा सके, बल्कि उसकी स्थिति को थोड़ा मजबूत भी किया जा सके। अगर केंद्र सरकार ऐसा करने में सफल रही तो निश्चित रूप से वैश्विक दबाव की स्थितियां समाप्त होने के बाद रुपया एक बार फिर अपने वास्तविक स्तर पर पहुंचने में कामयाब हो जायेगा। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि चुनावी वर्ष में रुपये का ज्यादा गिरना उसके खिलाफ एक चुनावी मुद्दा भी बन सकता है। इसलिए सरकार को वेट एंड वॉच की पॉलिसी से हटकर अब बाजार में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, वरना देश की अर्थव्यवस्था को तो नुकसान होगा ही, राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार को बड़ा झटका झेलना पड़ सकता है।

                                                                               विनय के पाठक (लेखक जाने-माने टीवी पत्रकार हैं)

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