सिक्के भी हैं भारतीय इतिहास की आधारशिला

मथुरा
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृतियां रजिष्ट्रीकरण अधिकारी डॉ. ओमप्रकाश लाल श्रीवास्तव का मानना है कि सिक्के प्राचीन इतिहास के निर्माण में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्रोत होते हैं। इनसे न केवल उस काल की आर्थिक स्थिति का पता चलता है, वरन उस काल की धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक आदि अनेक प्रकार की जानकारी मिलती है।  श्रीवास्तव ने यहां राजकीय संग्रहालय द्वारा उत्तर प्रदेश शैक्षिक प्रसार सेवा के अंतर्गत प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में सिक्कों का योगदान विषय पर आयोजित व्याख्यान में कहा, ‘सिक्के निखात निधि अथवा उत्खनन में प्राप्त होते हैं जो सोना, चांदी, तांबा, कांसा और सीसा आदि धातुओं के होते हैं। इनसे तत्कालीन धातु विज्ञान एवं उनकी बनावट आदि के आधार पर तकनीकी ज्ञान का पता चलता है।’ उन्होंने बताया कि प्रारंभ में सिक्के लेख विहीन होते थे किंतु, बाद में उन पर लेख लिखे जाने लगे। इससे पता चलता है कि किस शासक, नगर, निगम, अथवा व्यापारिक श्रेणी के द्वारा जारी किए गए हैं। सिक्कों पर प्राप्त होने वाले लेखों से तत्कालीन भाषा और लिपि की जानकारी प्राप्त होती है। इससे लिपि के विकास का भी अध्ययन किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘विदिशा, कौशाम्बी माहिष्मती, त्रिपुरी और एरच आदि प्राचीन नगरों द्वारा सिक्के जारी किए गए थे जिससे उनके व्यापारिक महत्व का पता चलता है। इसी प्रकार कनिष्क के सिक्कों पर भी चतुर्भुजी शिव के अतिरिक्त सूर्य, चंद्रमा एवं बुद्ध के अंकन के साथ ग्रीक लिपि में ओयसो, मीरो, माओ एवं बोड्डो लेख से इन धर्मों के प्रति उसकी भावना का पता चलता है।’ श्रीवास्तव ने बताया कि गुप्तकाल में चंद्रगुप्त कुमारदेवी के सिक्कों पर उल्लिखित लिच्छवयः से गुप्तों के राजनयिक विकास में लिच्छवियों के योगदान का संकेत प्राप्त होता है।

उन्होंने बताया, ‘सिक्कों के प्राप्तिस्थल के आधार पर भी शासक के स्थान का निर्धारण किया जाता है, किंतु इसमें काफी सतर्कता की आवश्यकता पड़ती है। कौशाम्बी से प्राप्त रुद्रदेव के सिक्के के आधार पर समुद्रगुप्त के इलाहाबाद प्रस्तर अभिलेख में वर्णित रुद्रदेव की पहचाChandra-4814.2Ev-503.20न करके उसे कौशाम्बी का शासक मान लिया गया था, किंतु उस सिक्के की धातु एवं तकनीकी कौशाम्बी की न होकर हरियाणा-पंजाब की है। अतः रुद्रदेव हरियाणा-पंजाब का शासक ज्ञात होता है।’ इसी प्रकार वृन्दावन में द्वादिशादित्य टीला एवं मौरा से प्राप्त इष्टकाभिलेख में उल्लिखित गोमित्र की पहचान मथुरा से प्राप्त सिक्के वाले गोमित्र से की जा सकती है। इस प्रकार सिक्कों से नई जानकारी तो प्राप्त होती ही है। साथ ही अन्य स्रोतों से ज्ञात तथ्यों की पुष्टि भी होती है।

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